प्रतिशब्द

बाज़ार जब आदमी का  आदमीनामा तय कर रहा हो  जब धरती को स्वप्न की तरह देखने वाली आँखें  एक सही और सार्थक जनतंत्र की प्रतीक्षा में  पथरा गई हों  सभ्यता और उन्नति की आड़ में  जब मानुष को मारने की कला ही  जीवित रही.

इस दीवार के सामने एक खिड़की खुलती है

1. तथाकथित अति सभ्य और संवेदनशील समाज में सब ओऱ दीवारें चुन दी गई हैं और हर दीवार के अपने दायरे  बनाए गए हैं  इन दायरों -दरो -दीवारों  को फाँद कर  हवा तक को  बहने की इजाज़त नहीं  2. खिड़कियाँ खोलने पर.

तलाश

साभार : गूगल  असंख्य चेहरों में  आँखें टटोलतीं है  एक अप्रतिम चित्ताकर्षक चेहरा - जो प्रसन्न-वदन हो  - जो ओस की नमी और गुलाब की ताजगी से भरी हो  - जो ओज, विश्वास और आत्मीयता से परिपूर्ण - जो बचपन सा  निष्पाप   -.

पचास की वय पार कर

(चित्र : गूगल साभार ) पचास की वय पार कर  मैं समझ पाया कि  वक्त की राख़ मेरे चेहरे पर गिरते हुए  कब मेरी आत्मा को छु गई, अहसास नहीं हुआ  उस राख़ को समेट रहा हूँ अब दोनों हाथों से  2. दो वाक्य के बीच जो  विराम-चिन्ह.

कविता शब्दों से नहीं रची जाती

कविता शब्दों से नहीं रची जाती आभ्यांतर के उत्ताल तरंगों को उतारता है कवि  कागज के कैनवस पर  एक शब्द-विराम के साथ / कविता प्रतिलिपि होती है उसके समय का  जो साक्षी बनती है शब्दों के साथ उसके संघर्ष का  जिसमें लीन.
Friday, September 26, 2014
Posted by Sushil Kumar
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