Posted by : सुशील कुमार Friday, May 6, 2011

गूगल: साभार 

घर वह नहीं
जहाँ आदमी रहता है
घरों में आदमी अब कहाँ रहता है

जिसे तुम घर कहते हो
वह तो एक तबेला है
लानतों के सामान यहाँ
लीदों की तरह पसरे रहते हैं

हाँ, काँखते घोड़ों को अपनी देह से उतार
जिन खूँटों से आदमी
देर रात गये रोज़ बांधता है
सहुलियत के लिये उस जगह को
तुम घर कह सकते हो

क्योंकि तब उसके रोशनदानों से दरवाजों तक
अँधेरा परदे की तरह गिरता है
और ऊब और तनाव से लिपटा
सन्नाटे के साये में
कुछ देर के लिये वह जगह
एकान्त-निकेतन में तब्दील हो जाती है
जहाँ औरतें काम से निबरती हैं
बच्चे सपने बुनते हैं और
बुड्ढे दाँत किटकिटाते हैं

पर यह सब महज़ चंद घंटों का खेल है !

दरअसल वह कोई सराय जैसा है
या बनजारों के डेरा-सा
या लोगों के दिमाग में
पलता वहम
या फिर रात की खुमारी में डूबे
उस महल सा जहाँ
दिगम्बराओं की बाँहों में
कितने ही झक्क सफ़ेद कामदेव
झूलते नज़र आते हैं !

अब न घर सोता है
न धड़
क्योंकि घर बेहद डरा-सहमा
एक इंसान है
जो मुर्गे की पहली बाँग पर
तिलमिला उठता है और
सुबह होने तक
तिनका सा बिखर जाता है।

{ 13 comments... कृपया उन्हें पढें या टिप्पणी देंcomment }

  1. हर पंक्ति प्रभावित करती है..... घर तो वो होता है जहाँ सुकून मिले ....अब तो मकान हैं.....

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  2. हाँ, भाई सुशील जी… अब घर घर कहाँ रहे ?… घर अब खौफ़ पैदा करता है… घर अब बेचैन करता है… घर अब आदमी को भीतर से तोड़ता है… वो सुकून, वो छांव, वह अपनत्व जो दिनभर का थकामांदा आदमी घर पहुँच कर पाता था, अब नहीं रहे… बहुत प्रभावी कविता !

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  3. यथार्थ के दर्शन कराती रचना

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  4. GHAR KEE VARTMAAN STHITI PAR AAPNE BADEE KHOOBSOORTEE SE
    YANI NAPE - TULE SHABDON MEIN PRAKAASH DAALAA HAI .GHAR
    KEE AESEE DAYNIY STHITI KO DEKHTE HUE MAINE KABHEE SHRI
    MAHAVIR SHARMA KE BLOG ( SHAYAD AAPKO YAAD HO ) PAR APNEE
    GAZAL KAHEE THEE . USKAA MATLA THA -

    TERA MAKAAN HO YAA MERA MAKAAN HO
    AESA LAGE KI MAHAL KOEE AALISHAAN HO

    MAN KO SPARSH KAR JAANE WAALEE AAPKEE KAVITA KE LIYE
    AAPKO DHERON BADHAAEEYAN AUR SHUBH KAMNAAYEN .

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  5. अब न घर सोता है
    न धड़
    क्योंकि घर बेहद डरा-सहमा
    एक इंसान है
    जो मुर्गे की पहली बाँग पर
    तिलमिला उठता है और
    सुबह होने तक
    तिनका सा बिखर जाता है।....

    आज घर कहाँ रहे हैं...बहुत संवेदनशील और सशक्त प्रस्तुति..

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  6. अब न घर सोता है
    न धड़
    क्योंकि घर बेहद डरा-सहमा
    एक इंसान है
    जो मुर्गे की पहली बाँग पर
    तिलमिला उठता है और
    सुबह होने तक
    तिनका सा बिखर जाता है।


    bahut achi rachna hai eakdam sach ke kareeb bahut2 badhai...

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  7. sundar kavitaa susheel bhai, अपना संग्रह भिजवाईये .

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  8. प्रभावशाली....

    सत्य कहा घर तो भावनाओं से बनता है...

    मन को छूती सुन्दर रचना...

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  9. apne hi vajood ko lalkarti ek kavita. bahut sundar . sabhaar leena malhotra

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  10. Usha Raje Saxena

    54 Hill Rd, Mitcham, CR4 2HQ, UK
    Tel: +44 (0) 208 640 8328 (UK)
    Mob: +44 (0) 7871582399 (UK)
    Mob: +91 (0) 9960260771 (India)
    की टिप्प्णी जो मेरे ईमेल पर प्राप्त हुई -

    बहुत सुंदर!

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  11. aadarniy sir
    face -ook ke jariye aapke blog par pahli bar aai aur aapki lekhni ke aage nat mastak ho gai .
    aapki kavita ki har panktiyan aaj ke samaaj me faily hue sachchai ko yatarth purn v bade hi prabhav-shali dhang se prastut karti hain .
    aapne bilkul sach aur kewal sach hi likha hai aaj aab ghar ,ghar nahi saray -khana ho gaya hai .


    अब न घर सोता है
    न धड़
    क्योंकि घर बेहद डरा-सहमा
    एक इंसान है
    जो मुर्गे की पहली बाँग पर
    तिलमिला उठता है और
    सुबह होने तक
    तिनका सा बिखर जाता है।
    bahut hi sateek chitran
    bahut bhut badhai
    sadar naman ke saath
    ponam

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  12. thanks susil ji for your precious comments, your creation are extra ordinary, i feel my self honored as part of your proximity, love and regards

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