Posted by : सुशील कुमार Friday, April 26, 2013

गूगल: साभार 
कहने में तनिक संकोच नहीं कि
फूल, नदी, प्यार और सपनों से बनी थी अपनी जिंदगी

हाँसच है कि फूलों के दरमियाँ काँटे भी थे
नदी पर्वत का सीना चीरकर उतरी थी
प्यार भी सहना कईयों को दुशवार था
और सपने सब खुशफहम नहीं थे अपने
पर  प्यार के पुल में कभी  दरार नहीं आने दी हमने  




वक्त की नंगी तलवार लटकती रही जब-तब हमारे रिश्ते पर  
पर हमेशा ऐतवार है तुम्हारे प्यार पर 
कि फूल खिलते ही रहेंगे इस मरु में
कि नदी भी अविरल बहती रहेगी बाधाओं को रेत बनाती हुई 
कि देह के काठ होने तक भरपूर जीता रहूँगा उन सपनों को
जिनमें तुम और धरती जागती-पुलकती 
सुंदर स्वप्न-सा दिखती हो मेरे स्मृति-चित्र में आज भी! 

{ 4 comments... कृपया उन्हें पढें या टिप्पणी देंcomment }

  1. पर हमेशा ऐतवार है तुम्हारे प्यार पर
    कि फूल खिलते ही रहेंगे इस मरु में
    कि नदी भी अविरल बहती रहेगी बाधाओं को रेत बनाती हुई
    कि देह के काठ होने तक भरपूर जीता रहूँगा उन सपनों को,,,,,
    आपकी कविता ने दिल को छू लिया ....मुझे हमेशा से ही लगता रहा है कि ---प्रेम के बिना भी कोई कविता -कविता हो सकती है क्या ?....बधाई प्रेम के दो रूप संयोग और वियोग बस इन दो भावों में ही कविता अपने श्रेष ठत्तम रूप में उभर कर आती है

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  2. Respected Sir,
    Very nice , Heart touching .

    KUMAR RAMAN

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  3. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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  4. केवल कोमल और मधुर नहीं होता जीवन का कोई भी पक्ष ,अंतर्निहित विषम स्थितियाँ स्वीकारे बिना ग्रहण पूर्ण नहीं होता - यही सच है .

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