Posted by : सुशील कुमार Saturday, August 22, 2009

साभार : गूगल 
घर से बाज़ार तक बेतरतीब बिछे

सुन्दर, कागज के ये

रंग-बिरंगे फूलों के गुलदस्ते

और पॉलीथीन के गमले

बताते हैं कि भागमभाग इस दुनिया में

मन के किसी कोने,

सौंदर्य-प्रेम की अनुभूति

बची है अब भी जिसे

यादकर हम सिहरना चाहते हैं।


दौनी-निकौनी, खर-पतवार का झंझट नहीं,

न खाद, बीज और पानी ही डालना पड़ता है

धूप,हवा की भी ज़रुरत नहीं इन फूल-पत्तों को

और शयन-कक्षों से लेकर दुकानों तक को

सजाते हैं सगर्व हम इनके बगीचों से।


अच्छा तो लगता है यह सब पर

मन हरा-भरा आजकल नहीं रहता

न मन खिलता है न फूल

सुवास नहीं बिखरता अब

अंतस के आंगन में

बसंत कभी आता नहीं

मधुमक्खियाँ फूलों पर मँडराती नहीं

पंछी यहाँ आकर गाते नहीं

न बया अपने नीड़ बनाते

न हवाओं में डालियाँ ही झूलती हैं।

यंत्रवत् खड़े ये बगीचे

मन की बेकली नहीं हर पाते

न देख इन्हें हृदय ही हुलसता है कभी।

{ 8 comments... कृपया उन्हें पढें या टिप्पणी देंcomment }

  1. बहुत उम्दा और गहन अभिव्यक्ति!!

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  2. सचमुच अब हर जगह वसंत नहीं आता। कहीं कहीं इसे लाया जाता है।

    आये ऋतुराज कैसे इजाजत बिना
    राज दरबार पतझड़ का सजने लगा

    अच्छी रचना जो सोचने को मजबूर करती है।

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  3. सच में आजकल वसंत आता ही कहाँ है?....

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  4. जहां चारो ओर कृत्रिमता हो .. वहां वसंत कैसे आ सकता है !!

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  5. हमारे यहां चिडि़यां (गौरेया)
    पहले आती थीं
    अब आकर चहचहाती भी नहीं।

    कृत्रिमता का चढ़ा आवरण है
    मनमैटा हुआ सब पर्यावरण है

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  6. This comment has been removed by the author.

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  7. Sari hi chijen kritrim ho gayin hain,vastuen bhi aur sanvednayen bhi.

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  8. ek bachpan me kavita padhi thi-khoonti par tanga basant-plastic ke phoolon ka-uski yaad dila di.-Bhaut khoob!

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