Posted by : सुशील कुमार Friday, October 14, 2011





मेरी बारी में
महुआ का यह पेड़
दिन-दिन सूखता जा रहा है
अब फल नहीं आते उस तरह
न गमक ही उसकी
फैल पाती
भीतर वाले घर – ओसारे और पास वाले तलैया तक

कंक-सा होता जा रहा है यह पेड़
तुम्हारे जाने के बाद 

कहती है माँ  –
जब से तलैया का पानी सूखा है
सोनचिरैया भी
लापता हो गई इस पेड़ से
और पहाड़ के भूतों ने
यहाँ डेरा डाल दिया है 

 कौन देस चली गई
 
सोनचिरैया संग तुम
ताल का जल और महुआ की खुशबू उतारकर

कि लौटने का नाम नहीं लेती ?


{ 8 comments... कृपया उन्हें पढें या टिप्पणी देंcomment }

  1. शायद पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ |एक बहुत सुंदर सारगर्भित रचना पढ़ने को मिली आभार .......

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  2. इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  3. विछोह का दुःख झेलना आसान नहीं. सुंदर प्रस्तुति.

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  4. बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति....
    सदर...

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  5. SUNDAR ! ATI SUNDAR !!

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!!

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  7. एक प्रभावकारी और मन को छूने वाली कविता लगी आपकी…बधाई !
    सुभाष नीरव

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